"गुरुपुर्णिमा":-

कोटी कोटी सूर्यो का तेज,
जब गुरु में विलीन हो जाता है,
तो गुरु से जुडा पर्व,
"गुरुपुर्णिमा" क्यो कहलाता है?
जिस तरह,सुर्य की ही प्रभा परावर्तित हो,
चाँद की चाँदनी बन जाती है,
उसी तरह गुरु की प्रभा,शिष्य तक,
इसी सरल भाव से पहुँच जाती है।
गुरु का प्रखर तेज,शिष्य को सहज हो प्राप्त,
इसमे गुरु हृदय की प्रभा,मृदुता,प्रेरणा हो व्याप्त,
शिष्य के अँधियारे जीवन को दूर करने हेतु हो पर्याप्त,
इसलिये प्रत्येक शिष्य की कृतज्ञता प्राकट्य के लिये,
"गुरुपुर्णिमा" पर्व है परम आप्त।
-✍🏻डॉ. स्मृति नाईक

कोटी कोटी सूर्यो का तेज,
जब गुरु में विलीन हो जाता है,
तो गुरु से जुडा पर्व,
"गुरुपुर्णिमा" क्यो कहलाता है?
जिस तरह,सुर्य की ही प्रभा परावर्तित हो,
चाँद की चाँदनी बन जाती है,
उसी तरह गुरु की प्रभा,शिष्य तक,
इसी सरल भाव से पहुँच जाती है।
गुरु का प्रखर तेज,शिष्य को सहज हो प्राप्त,
इसमे गुरु हृदय की प्रभा,मृदुता,प्रेरणा हो व्याप्त,
शिष्य के अँधियारे जीवन को दूर करने हेतु हो पर्याप्त,
इसलिये प्रत्येक शिष्य की कृतज्ञता प्राकट्य के लिये,
"गुरुपुर्णिमा" पर्व है परम आप्त।
-✍🏻डॉ. स्मृति नाईक
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