मेरे गुरुदेव का गुरुद्वारा,
जहाँ बहती है निर्मल प्रेम की धारा,
वरना फिरता मेरा मन मारा मारा,
जो ना मिलता मुझे गुरुद्वारा।
(सद्गुरु से मिलने से पुर्व की अवस्था,ना जाने कितने ही जन्मो से)
भटक भटक कर इतना भटकी,
कि भटक गई मेरी राह भी,
चाहते इतनी बढ़ती गई जीवन में,
कि भूल गई असली चाह भी,
ग्रंथियों में इतनी उलझ गई,
कि काम ना आई कोई आह भी,
सिसक सिसक कर इतना सिसकी,
की दूर हुई अपनी दरख्वास्त से भी।
(सद्गुरु मिलने के बाद क्या हुआ)
आया समय जब,दरस मिला तेरा,
मेरा मन हारा और मिला इसे तेरे चरणों का सहारा,
जब सबने था मुझे धुत्करा,
तब मिला केवल तेरे ही प्रेम का सहारा,
तेरी ही कृपा से तब जीवन खिला आया सवेरा,
अब समझ आया तेरे प्रेम की रीत का कहाँ है बसेरा।
मेरे जीवन को बडी ही फुरसत से,
तुने यूँ सवारा,
मानो शापित किसी पत्थर को छूकर,
तुने अहिल्या को हो तारा,
क्या पता क्या होता जो तु ना मिलता,
यह सोचकर भी काँपती है आत्मा,
कि क्या होता जो ना मिलता मुझे तेरा द्वारा,
ना मिलती मुझे प्रेम की धारा,
फिरता मेरा मन मारा-मारा,
जो ना मिलता मुझे तेरा द्वारा,
जो ना मिलता मुझे गुरुद्वारा।
-✍🏻 डॉ.स्मृति देशपांडे नाईक





