Tuesday, July 16, 2019

गुरुद्वारा:-


गुरुद्वारा:-

मेरे गुरुदेव का गुरुद्वारा,
जहाँ बहती है निर्मल प्रेम की धारा,
वरना फिरता मेरा मन मारा मारा,
जो ना मिलता मुझे गुरुद्वारा।
(सद्गुरु से मिलने से पुर्व की अवस्था,ना जाने कितने ही जन्मो से)
भटक भटक कर इतना भटकी,
कि भटक गई मेरी राह भी,
चाहते इतनी बढ़ती गई जीवन में,
कि भूल गई असली चाह भी,
ग्रंथियों में इतनी उलझ गई,
कि काम ना आई कोई आह भी,
सिसक सिसक कर इतना सिसकी,
की दूर हुई अपनी दरख्वास्त से भी।
(सद्गुरु मिलने के बाद क्या हुआ)
आया समय जब,दरस मिला तेरा,
मेरा मन हारा और मिला इसे तेरे चरणों का सहारा,
जब सबने था मुझे धुत्करा,
तब मिला केवल तेरे ही प्रेम का सहारा,
तेरी ही कृपा से तब जीवन खिला आया सवेरा,
अब समझ आया तेरे प्रेम की रीत का कहाँ है बसेरा।
मेरे जीवन को बडी ही फुरसत से,
तुने यूँ सवारा,
मानो शापित किसी पत्थर को छूकर,
तुने अहिल्या को हो तारा,
क्या पता क्या होता जो तु ना मिलता,
यह सोचकर भी काँपती है आत्मा,
कि क्या होता जो ना मिलता मुझे तेरा द्वारा,
ना मिलती मुझे प्रेम की धारा,
फिरता मेरा मन मारा-मारा,
जो ना मिलता मुझे तेरा द्वारा,
जो ना मिलता मुझे गुरुद्वारा।
-✍🏻 डॉ.स्मृति  देशपांडे नाईक

ए बेदाग पाक नूर!

ए बेदाग पाक नूर!:-

 


ए बेदाग पाक नूर!
तू जानता है ज़रूर,
मेरे दिल का ये सुरुर,
ना हो कोई फ़ासला,
ना हो हम तुझसे दूर,
ना हो हम कभी मजबूर,
ना आए हमे कभी भी गुरुर,
जो ले जाए हमे तुझसे थोडा भी दूर,
ऐसा ना हो जाए कभी,पर फिर भी,
माफ़ कर देना हमें और गले लगा लेना ज़रूर,
समझाके मेरे दिल को फिर जगाना वही सुरुर,
ए बेदाग पाक नूर!
ए बेदाग पाक नूर!
       -✍🏻 डॉ.स्मृति देशपांडे नाईक

आप(मेरे सद्गुरु):-

आप(मेरे सद्गुरु):-


प्रभुत्व भी आप,
विभुत्व भी आप,
अंत:करण का कण कण आप,
अंतरंग का 'हर' रंग आप,
हर भी आप,
हरि भी आप,
प्रत्येक करण का कारण आप,
सगुण-साकार भी आप,
निर्गुण-निराकार भी आप,
प्रेम तरंग का हर स्वर आप,
जीवन ज्योत की लौ भी आप,
जीवन का गन्तव्य भी आप,
संकल्प भी आप,
ध्येय भी आप,
चल भी आप,
अचल भी आप,
प्राणवायु में प्राण भी आप,
सृष्टि में व्याप्त भी आप,
अव्याप्त की सूक्ष्मता भी आप,
मेरे लिये मेरा अस्तित्व ही आप,
आप का सगुण रुप मेरे सद्गुरु का स्वरुप है,
मेरे लिये मेरे गुरु का रुप है।
            -✍🏻 डॉ. स्मृति देशपांडे नाईक

"गुरूदक्षिणा"

"गुरूदक्षिणा" :-



हम उन्हें क्या कुछ दे,
जो स्वयं हमारा दाता है,
परंतु ग्रंथो में फिर,
'गुरूदक्षिणा' शब्द क्यों आता है?
हमारे लिये इस शब्द का अर्थ समझना,
साक्षात मोक्ष प्रदाता है।
(तो क्या अर्थ है"गुरूदक्षिणा"शब्द का?)
हो गुरु आज्ञापालन,
और रहे हम दक्ष,
जब भी जागे कोई एषणा,
यही तो है तत्व रुप से "गुरूदक्षिणा"।।
                 -✍🏻डॉ.स्मृति देशपांडे नाईक

गुरुपुर्णिमा

"गुरुपुर्णिमा":-




कोटी कोटी सूर्यो का तेज,
जब गुरु में विलीन हो जाता है,
तो गुरु से जुडा पर्व,
"गुरुपुर्णिमा" क्यो कहलाता है?
जिस तरह,सुर्य की ही प्रभा परावर्तित हो,
चाँद की चाँदनी बन जाती है,
उसी तरह गुरु की प्रभा,शिष्य तक,
इसी सरल भाव से पहुँच जाती है।
गुरु का प्रखर तेज,शिष्य को सहज हो प्राप्त,
इसमे गुरु हृदय की प्रभा,मृदुता,प्रेरणा हो व्याप्त,
शिष्य के अँधियारे जीवन को दूर करने हेतु  हो पर्याप्त,
इसलिये प्रत्येक शिष्य की कृतज्ञता प्राकट्य के लिये,
"गुरुपुर्णिमा" पर्व है परम आप्त।
                         -✍🏻डॉ. स्मृति नाईक

Saturday, July 6, 2019

फर्क:-

फर्क:-


चलता रहता है करवाँ,
हम चले ना चले,
हँसता है ये जहान,
इसमे हमारी किलकारियां,
जुडे ना जुड़े,
बस फर्क तब पडता है,
जब हम इसमे शामील हो,
क्योकी तब किसी को,
फर्क पडे ना पड़े,
हमारे दिल को जरुर,
सुकून का अहसास मिलता है।
                    ✍🏻डॉ स्मृति नाईक

Wednesday, October 3, 2018

अपनी सोहबत

अपनी सोहबत😊❤:-

कुछ तनहा पल अपने साथ बिताये,
पता चला मुझे कि अपने आप मे,
एक और जहान है,
इस जहान मे,
एक धडकता दिल है,
एक आलम है,
एक मस्ती है,
एक खुशी है,
और "मैं" हूँ।
अपने आप मे खुश,
अपने आप से खुश,
तनहाई मे हम अक़्सर ,
लोगो के बारे मे,
बीते लमहों के बारे मे,
सोचते इतने खो जाते है,
कि हम अपने आप के साथ,
 रहना ही भूल जाते है,
दूसरो से ऐसे पेश आओ,
जैसे तुम अपने आप से पेश आते हो,
खुश रहो,आबाद रहो,
अपनी मस्ती मे रहो,
अपनी हस्ती मे रहो,
अपने अस्तित्व को ना भूलो,
अच्छे पल,अच्छे लोग मिले ना मिले,
अपने सोहबत को इतना,
"एन्जॉय"करो,
कि आपको लगे की आप एक,
"अच्छी कंपनी"मे है।
फिर ये दूनियाँ जो कहे,
जो समझे,
आपका कारवां तो कभी ना कभी,
आपको मिलेगा ही,
चलते रहो,
"ऐसा होगा ही" इस पर विश्वास रखो।
               -✍ डॉ.स्मृति नाईक