Wednesday, February 15, 2017

खुदा की रहमत

खुदा की रहमत:-


दिल के समंदर में डुबकी लगाने पर ही,
हमें हमारे अंदर छीपे मोती नज़र आते है,
पर ऐसी नज़र जो मोती को सराहे भी,
ऐसी नज़र पाने के लिए,
हम अनेको दौर से गुजरते जाते है।
कभी खुशी मतलब खुद के दिल जैसा,
कभी गम मतलब खुदा के रहम जैसा,
भ्रम है कि गम आया है,
यह अपने साथ एक सीख की कड़ी लाया है,
इस कडी के सुलझते ही,
ये ही खुशी की फिर निंव बन जाती है,
खुदा के रहम की तब याद आती है।
आज जो भी है हो रहा,
वह उस खुदा का ही तो रहम है,
साँसे है चल रही आज,
जिंदा हूं मैं आज,
कल का सवेरा भी उसी की रहमत पर होगा।
सब कुछ तय है इस जिन्दगी में,
बस हालात सबके अलग है,
कोई हमें समझेगा ही,
यह कहना भी गलत है।
बस चलते रहना अपना काम है,
खुदा ने बक्शा है जो ये दिन आज,
वही मेरे लिए है खास,
चाहे आए या ना आए मुझे इस दिन के हालात रास।
पर मेरी नज़र इसी दौरान ही बनेगी,
जो मेरे अंदर के मोती को खोजने,सराहने और तराशने,
का मुझे एक मौका देगी और मेरे लिए,
मेरी ज़िन्दगी का ये ही फिर खज़ाना होगा,
और जब मेरी जिन्दगी में,मै पीछे मुडकर देखुंगी,
तो ये ही मेरे लिए, मेरे खुदा की,
 बंदगी का बहाना होगा।
 
                         -✍ डॉ.स्मृति नाईक