Monday, November 21, 2016

ऐसी है ज़िन्दगी आजकल

ऐसी है जिन्दगी आजकल:-
जी रहे है सब ही यहाँ,अपने अपने तरीके से,
जिन्दगी भी है बढ रही,अपने ही सलीके से,
मोबाईल है सब ही के पास,स्माईली भी सेम है,
पर कोई भी अब प्यार को क्यों करता नही क्लेम है,
प्यार सबको है अच्छा लगता,पर शुरुवात करने से है कतराता,
बातो की जगह अब लाईक से ही सबका मन है बहल जाता,
कहते है सब,अब टाईम कहाँ मिलता है,
फैसबुक और वस्ट्सएप पे घंटो जो निकलता है,
मै नही कहती कि यह सब गलत है,
मै ये भी नहीं कहती कि बिता हर पल सक्त है,
मेरी चाह है -तो बस दिल से दिल का मिलना,
आंखो में देखकर ही जज्बातो को समझना,
अब क्यों नही अंखो की जुबान कोई समझता?,
अब क्यों नही प्यार से कोई दिल के लब्ज़ खोलता?
अब सब बंद हो गया,सोचना भी-समझना भी,
अब किसी काम का नहीं किसी का तजुर्बा भी,
अब हर कोई गुगल पे सर्च इंजीन खोलकर बैठा है,
"मुझे पता है कितना,यहीं सोचकर ऐंठा है,"
फिर कब कोई दादी माँ की पोटली को खोलना चाहेगा,
फिर कब कोई पौराणीक कथाओ में मन अपना रमाएगा,
यहाँ तो सब दौड रहे है,और पता भी नही है कहाँ,
पर जीने के लिए हमे भी यह सब करना ही होगा, वरना पीछे छोड जाएगा मुझे ये जहान,
तो चलो मै भी अब दौड रही हूँ,पर कोई तो बताए कब तक? और
कहाँ तक?
काश ए खुदा तु आ जाए हाथ थाम ले मेरा और संग अपने ले जाए मुझे तु ,जहाँ कोई दिखावट ना हो,
प्यार ही प्यार हो जहाँ,किसी और जज्बात  की कोई आहट न हो,
फिर धीरे धीरे यहाँ तुम तक सब चले आएँगे,
फिर एक नया जहान बसेगा,जहाँ बरसेगा तेरा ही नूर,
फिर होगा प्यार हर दिल में,और ये दिल धड़केगा फिर से,
जज्बात होंगे इसमे,और फिर ये जरुर गायेगा,
तेरे इस जहान में इन्सान स्माईली के सहारे नहीं,
खुद से ही कहकहे लगाएगा।
                                     -✍डॉ.स्मृति नाईक

7 comments:

  1. सही लिखा आपने। जीवन की आपाधापि में, बढ़ते technolgy के युग में हर पल के आनंद को भूल बैठे हैं। इन दादी की कहानियों के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी एक संस्कृति,विचारों,संस्कारों को बड़ी आसानी से बीज की तरह मन में रोप दिया जाता था।
    कविराज सद्गुरु की आप जैसी कवियत्री शिष्या होना उनकी परम्परा को ही आगे बढ़ाता है।
    कविता लिखने वाले के मन में सजगता,सरलता,संवेदनशीलता होती है, जो की ईश्वर की अनुपम कृपा है।
    बहुत साधवाद आपको

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